….सेवा के लिए हाजिर है गांव हाजिपुर

 

vikas verma@newschakra.org

न्यूज चक्र@ कोटपूतली । किसी बस स्टैण्ड पर बस रूकते ही पानी की बोतल लेकर दौड़ लगाते या बस में चढ़कर पानी बेचते लोगों को तो आपने जरूर देखा होगा।…और कई बार बहस करने के बाद बावजूद एक बोतल के 20 रूपए तक आपने भी चुकाए होगें। क्यों ना करें कंठ सुखाती गर्मी में गला तर करने के लिए मजबूरी में प्यासे को दौगुने दाम भी चुकाने पड़ते हैं, यह तो आपने अक्सर देखा या सहा होगा। लेकिन आज जो हम आपको बता रहे हैं उसे पढ़कर आपका सर उन सेवकों के लिए आदर से झुक जाएगा और आप मन ही मन उन्हें प्रणाम भी करेगें।

…तो चलिए ले चलते हैं हम आपको अलवर जिले के एक गांव हाजिपुर में। जैसा गांव का नाम, वैसा ही काम। गर्मियों की शुरूआत होते ही जैसे पूरा गांव राहगीरों की सेवा के लिए उमड़ पड़ता है। गांव के बस स्टैण्ड से गुजरने वाला कोई वाहन यहां बिना ठहरे नहीं जाता है। गांव के लोग दोनों हाथों में ठण्डे पानी के जग व मग्गे लिए यात्रियों की खिदमत में दौड़ पड़ते हैं।…और जब तक बस या अन्य वाहन में एक-एक यात्रि तक ‘अमृत’ नहीं पहुंच जाता है, वाहन भी हिलता नहीं है।
    गांव की यह परम्परा पिछले 10 सालों से बरकरार है। कहा जाता है कि प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा धर्म यानी सेवा माना गया है, और हाजिपुर गांव के लोग यह मौका गंवाते नहीं हैं। ग्रामवासी और प्याऊ के सेवादार नंदलाल ने बताया कि दस वर्ष पहले इस परम्परा की शुरूआत गांव के ही योगेन्द्र सिंह शेखावत ने की थी, जिसमें अब सभी ग्रामवासी तन मन से साथ निभाते हैं। ग्रामवासी रामौतार सैनी, धूणाराम, रामवतार कुम्हार, गिर्राज कीर व दाताराम यादव ने बताया कि यहां प्याऊ के लिए मटके सोहन सिंह की ढ़ाणी से आते हैं, और प्याऊ पर हर समय 15 से 20 सेवादार हाजिर रहते हैं। हर वर्ष 1 अप्रैल से ग्रामवासी इसकी शुरूआत करते हैं और गर्मी रहने तक या जुलाई माह तक इसे संचालित करते हैं।

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